गरीबी नाम तो सुना
ही होगा हालाँकि इसका जिक्र अब सिर्फ चुनाव के वक्त होता है। इन्ही गरीबों को जीवित
रखने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा आयुष्मान दिया गया ताकि गरीब की आयु लम्बी हो। अब
आपको आश्चर्य होगा की मै इस योजना का जिक्र करके क्या साबित करना चाहता हु? आपको बता
दें कि इस योजना के प्रचार के हिसाब से भारत के प्रत्येक गरीब को पांच लाख रूपये सालाना
इलाज की सुविधा है। भारत के किसी भी कोने में किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल में इलाज
करा सकता है। इस योजना का आगाज पूरे तामझाम के साथ किया गया प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना से ज्यादा इसे आयुष्मान भारत के नाम से प्रचारित किया गया। फिर क्या बीमारी से
जूझ रहे गरीबों के चेहरे पर मुस्कान देखने को मिलने लगी कि कोई तो है जो उनके इस गरीबी
हालत में भी उनको स्वस्थ जीवित रखना चाहता है। बड़ी-बड़ी लाइनें लगाकर बूथ लेवल पर कैंप
करके लाखों की संख्या में गरीबों को चंद दिनों में ही योजना का कार्ड थमा दिया गया।
गरीबों को पहली बार एहसास हुआ कि प्रधानमन्त्री ने उन्हें पांच लाख रूपये इलाज के लिए
दे दिए हों जो वह एक साल में अपने स्वास्थय के ऊपर खर्च कर अपनी आयु को बढ़ा लेगा। और
सच भी यही है प्रतिवर्ष पांच लाख रूपये किसी भी व्यक्ति को, परिवार को स्वस्थ रखने
के लिए बहुत है। अब होना क्या था गरीबों ने अपने कार्ड लेकर प्राइवेट अस्पतालों के
दरवाजे खटखटाने लगे क्यों कि उन्हें उम्मीद थी की प्रधानमन्त्री ने इन अस्पतालों को
पांच लाख रूपये तक का इलाज करने लिए आदेश जारी कर दिया होगा लेकिन क्या प्रक्रिया या
नियम इतने सरल थे कि गरीबों को तुरंत इलाज मुहैया कराया जा सके? जी नहीं बिलकुल नहीं।
फिर आप कहेंगे कैसे तो चलिए अब आपको समझा देते है पूरी योजना और उसके नियम।
केंद्र सरकार ने
2018-19 के फाइनेंशल वर्ष के तहत आयुष्मान भारत योजना को शुरू करने की घोषणा की हैं।
इस योजना के अंतरगर्त सभी लाभार्थीओ को स्वास्थ्य का लाभ मिलेगा। 2018-19 के बजट में
पेश की गयी योजनाओ में से सबसे बड़ी और महत्वकांक्षी योजना हैं। इस योजना का मुख्य हेतु
देश के आर्थिक रूप से कमजोर लोगो को सहायता प्रदान करना हैं। आयुष्यमान भारत योजना
के नाम पर 'नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन इन्शुरन्स' का शुभारंभ किया है। इस योजना के तहत
लाभार्थी को 5 लाख तक का स्वास्थय बिमा दिया जायेगा।इस योजना के अंतरगर्त हर साल 5
लाख रूपये की सहायता 10 करोड़ परिवार को उपचार के लिए प्रदान किये जायेगे। आयुष्यमान
भारत योजना एक इन्स्योरेन्स मॉडल या ट्रस्ट मॉडल पर काम करेगी। इस योजना के तहत गरीब
परिवारों के लोग 1 अप्रैल से 5 लाख तक का इलाज मुफ्त में करवा सकेंगे। योजना में गरीब
व्यक्ति के पास बीमारी के वक्त कोई इंस्युरेन्स न हो तो गरीब लोग इस योजना की मदद से
इलाज करवा सकते हैं। योजना में शरुआती दौर पर परिवार के 5 लोगो को शामिल किया गया था
लेकिन अब परिवार के सभी लोगो को इस योजना का लाभ देने के लिए सरकार सोच रही हैं। योजना
में लाभ लेने वाले लोगो का आर्थिक एवं सामाजिक जनगड़ना (SECC) 2011 के अंतरगर्त रजिस्ट्रेशन
होना आवश्यक हैं। योजना का लाभ लेने के लिए व्यक्ति का आधारकार्ड होना चाहिए और वह
आधारकार्ड उसके परिवार समग्र आईडी से लिंक होना चाहिए। अगर ऐसा न होतो व्यक्ति इस योजना
का लाभ नहीं ले सकता। सामाजिक आर्थिक
जातिगत गणना (SECC) में चिन्हाकिंत लाभार्थियों के
उपचार हेतु भारत
सरकार द्वारा 60 प्रतिशत
तथा राज्य
शासन द्वारा 40 प्रतिशत
व्यय भार वहन
किया जावेगा। म.प्र.शासन द्वाराउक्त योजनामें जोड़े जारहे लाभार्थियों केउपचार पर व्यय होनेवाली 100 प्रतिशत राशि वहनकी जावेगी। म.प्र.में कुल संभावित परिवार – 1.4 करोड़परिवार है।
अब आपको लगने लगा होगा
कि सही तो है इतनी अच्छी योजना है बुराई क्या है? कही मैं मोदीजी का विरोधी तो नहीं
हु जो ऐसा लिख रहा हूँ जी नहीं बिलकुल नहीं। अब आपको समझाते हैं इस योजना का क्रियान्वयन
कैसे हो रहा है? दरअसल कार्ड लगभग लाखों की संख्या में बने हुए है शुरूआती प्रक्रिया
में निजी अस्पतालों को भी जोड़ लिया गया है। और इलाज भी प्रारम्भ हो चूका है लेकिन बिमारियों
को भी आरक्षण के रूप में बाँट दिया गया है मसलन इस योजना में 1300 बिमारियों को चिन्हितकिया गया जिसमे 473 बिमारियों को सरकारी अस्पतालों के लिए आरक्षित रखा गया है मतलब
जो सरकारी अस्पतालों के लिए आरक्षित बिमारिओं की सूची है उन बिमारियों का इलाज निजी
अस्पताल नहीं कर सकते। आप समझ रहे थे की सरकारी अस्पतालों की अव्यस्थाओं से पीछा छूटेगा
तो आप गलत सोच रहे थे। आपको सामान्य बीमारी, डिलेवरी, बच्चेदानी के ऑपरेशन, अपेंडिक्स
के ऑपरेशन, हर्निया यहाँ तक की हड्डियां भी टूटी होगी तो आपका इलाज सरकारी अस्पतालों
में ही होगा। ऐसे ही 473 सामान्य बिमारियों को भी सरकारी अस्पतालों के लिए आरक्षित
किया गया है। अब आपको निजी अस्पताल में इलाज करना चाहते है तो सूची के हिसाब से बीमार
होना पड़ेगा या दुर्घटना के शिकार होते वक्त आपको सोचना पड़ेगा। मसलन आपकी एक हड्डी टूटे
तो सर या छाती की हड्डी भी टूटनी चाहिए तभी आपको निजी अस्पताल में उपचार मिल सकेगा
अन्यथा आपके लिए सरकारी अस्पतालों के दरवाजे 24 घंटे खोलकर रखे गए है। सोचिये किसी
गरीब व्यक्ति का पांव टूट जाये और आयुष्मान भारत योजना का कार्ड लेकर दर्द में कराहता
हुआ निजी अस्पताल पहुंच जाये तो उसका इलाज नहीं होना चाहिए? अब आप कहेंगे क्यूँनही?
ऐसा होगा नहीं क्यों की सूची में शामिल नहीं है।
अब आप सोच रहे होंगे
की ठीक है 473 सरकारी अस्पताल में होगा बाकि के 827 बिमारियों का इलाज तो निजी अस्पताल
में होगा ही। इसमें भी आप गलत सोच रहे है दरअसल नियम है कि प्राइवेट अस्पतालों में
आपको ओपीडी सुविधा नहीं मिलेगी यदि आप ओपीडी में दिखाना चाहते हैं तो आपका यह कार्ड
काम नहीं आएगा और तो और मान लीजिये आपने फीस जमकर ओपीडी दिखा भी लिया तो भी सूची के
अनुसार बीमारी नहीं है तो बीमारी का इलाज सरकारी अस्पताल में ही कराना होगा।
उम्मीद है अब आपको
समझ में आ गया होगा। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है नियम है कि प्राइवेट अस्पतालों का
भुगतान शासन द्वारा १५ दिन के भीतर कर दिया जायेगा परन्तु अभी तक मध्यप्रदेश के 2000
से ज्यादा बिल है जो अभी तक भुगतान नहीं किये गए है। ऐसे में निजी अस्पताल भी इलाज
करने में असमर्थता जता रहे है मतलब इलाज करने से कतरा रहे हैं ऐसे हालत में भी अगर
आप सोचते है कि आपके पास कार्ड है तो गलत सोचते हैं।
सरकारों को भी
चाहिए कि जनहित
की योजनाएं कम
से कम स्वास्थय
सम्बन्धी योजनाएं बनाते समय
आरक्षित, अनारक्षित का खेल
न खेलें। बाकि समय
तो पूरी राजनीती
आरक्षण से शुरू
होकर आरक्षण पर
ही ख़तम हो
जाती है।
-दिनकर
प्रकाश, लेखक, समाजसेवी

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