मुर्दे का वेंटीलेटर कनेक्शन
अफवाहों का बाजार गर्म है। सबसे ज्यादा अफवाहों का बाजार भारत में फलता फूलता रहा है। पहले कानों कण अफवाह फैलती थी तो लोग देर से इसके शिकार हो पाते थे लेकिन अब सोशल मीडिया के माध्यम से जबर्दस्त फेक न्यूज़ और अफवाहों को परोसा जा रहा है। बढ़ती अफवाहों का आलम यह है कि अब आदमी तो आदमी ही अफवाह बनता जा रहा है। इसी कड़ी में एक और अफवाह सोशल मीडिया पर इनदिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। इस पोस्ट में मुर्दों से लूट का जिक्र करके कानून बनाने की मांग तक हो गयी है ताकि मुर्दों को लूटा न जा सके ।दरअसल फेसबुक पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है जिसमें एक लड़की की फोटो लगी है और लिखा है-
"सरकार को एक
विधेयक यह भी लाना चाहिए कि किसी भी सरकारी या प्राइवेट हॉस्पिटल में कोई भी मरीज यदि
मर जाता है तो उसका सारा बिल माफ़ किया जाना चाहिए। इस बात से यह फायदा होगा कि डॉ मरीज
को जिन्दा रखने की पूरी कोशिश करेगा और यदि डॉ की पूरी कोशिश के बाद मरीज मर भी गया,
तो अनावश्यक रूप से वेंटीलेटर या अन्य तरीके से उससे पैसे बनाने का नाटक कोई भी प्राइवेट
अस्पताल नहीं करेगा। यदि सुझाव अच्छा है तो शेयर करते जाना वार्ना क्या है, देश तो
चल ही रहा है और चलता रहेगा।"
इस पोस्ट के माध्यम
से पूरे समाज में एक धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है कि डॉक्टर अस्पताल मरीजों को
वेंटीलेटर पैसा बनाने के लिए लगते हैं। आप भी यही सोच रहे होंगे। इसलिए तो आपने भी
शेयर किया था। तो आइये इस मुद्दे की तह तक जाकर तकनिकी पहलूओं को समझते है क्या अस्पतालों
के लिए ऐसा करना संभव है? चूँकि मुर्दे को वेंटीलेटर लगाकर पैसा बनाने की बात कही जा
रही है तो पहले वेंटीलेटर क्या होता है ? यह समझना हमारे लिए बहुत जरूरी है।
वेंटीलेटर को सामान्य
भाषा में कहा जाय तो 'कृत्रिम श्वांस प्रणाली' कहते हैं यह मशीन उन मरीजों को लगायी
जाती है जो ठीक तरह श्वास नहीं ले पाता या छाती में टीबी, स्वाइन फ़्लु, निमोनिया जैसी
गंभीर बिमारियों में शरीर में ऑक्सीजन की पूर्ती नहीं हो पाती जिसकी वजह से मरीज की
जान भी जाने का खतरा रहता है ऐसे में वेंटीलेटर ही एकमात्र सहारा है जिसके माध्यम से
जान बचाया जा सकता है। वेंटीलेटर का उपयोग गंभीर रूप से बेहोश मरीजों में भी किया जाता
है क्यों कि बेहोश मरीज के श्वास लेने की क्षमता कम हो जाती है जिसके कारन शरीज में
ऑक्सीजन की कमी के साथ साथ कार्बनडाई ऑक्साइड शरीर में में जमा होना प्रारम्भ हो जाता
है फलस्वरूप ब्रेन डैड या हार्ट बंद होने के कारण मरीज की मौत हो जाती है ऐसी स्थिति
में सिर्फ वेंटीलेटर ही एक सहारा है जो कुछ प्रतिशत मरीजों को जीवनदान दे सकता है। कुछ प्रतिशत इसलिए कि वेंटीलेटर की सहायता से श्वास
ले रहे मरीजों में 65-70% लोगों की ही जान बच पाती है। मरीजों का निजी संस्थानों में
खर्च अत्यधिक आता है।
अब बात आती है मुर्दे
को वेंटीलेटर लगाकर पैसा बनाने की तो ये सिर्फ कानूनी तरीके से ही गलत नहीं है बल्कि
वैज्ञानिक रूप से भी संभव नहीं है। अब आप सोचेंगे
कैसे फलां चैनल, अखबार में मैंने पढ़ा था की डॉक्टरों ने जल्लाद बनकर मुर्दे को पांच
दिन तक वेंटीलेटर लगाकर रखा था सिर्फ पैसे ऐठने के लिए। तो आज आपको हम कुछ वैज्ञानिक
पहलूँ बताते है जो काफी हद तक आपका ज्ञान बढ़ाने में मदद करेंगे।वैज्ञानिक रूप से मृत
शरीर को चार-छह घंटे में अकड़ जाती है जिसे 'रिगोर मोर्टिस' कहा जाता है नाम लैटिन शब्द
में है जिसमें रिगोर मतलब अकड़ना और मोर्टिस मतलब डेथ होता है। यानि मरीज के मृत्यु
के छह घंटे के भीतर ही अकड़ने लगता है। इसके बाद इसी कड़ी में प्रत्येक घंटे निम्न तरह
के बदलाव आते है:-
- १-२ दिन: पीला पड़ना, अलगोर, शरीर अकड़ना, लइवोर और उसके बाद सडन शुरू होती है।
- २-३ दिन: पेट कि सतह पर रंग फीका पड़ने लगता है। गैसों के बनने की वजह से पेट फूलने लगता है।
- ३-४ दिन: मलिनकिरण फैलता जाता है, और मलिनकिरण के फैलने कि वजह से शरीर की नसें दिखने लगती हैं।
- ५-६ दिन: पेट पूरी तरह फूल चूका होता है और त्वचा पर फफोले दिखने लगते हैं।
- १०-20 दिन: शरीर कला पड़ने लगता है और शरीर से हानिकारक बदबू आने लगती है।
- २ हफ्ते: अंदरूनी gas के ज्यादा से ज्यादा दबाव के कारण पेट पूरी तरह फूल जाता है।
- ३ हफ्ते: ऊतक नर्म हो जाते हैं। शारीरिक अंग फटने लगते हैं। नाखून गिरने लगते हैं।
- ४ हफ्ते: नर्म अंगों में पानी बनने लगता है, चेहरा पहचानने अयोग्य हो जाता है। अंततः शरीर ढांचे में परिवर्तित हो जाता है।
ये तो बॉडी के चेंज होने की प्रक्रिया है अब
आपके मुद्दे पर आते हैं दरअसल मरने के बाद किसी भी व्यक्ति को वेंटीलेटर नहीं लगाया
जाता बल्कि जब मरीज के हार्ट लंग्स काम करना पूरी तरह से बंद हो जाते है या बंद होने
के करीब रहते है। तभी इस मशीन के माध्यम से जान बचाने की कोशिश की जाती है. जिसमे 60-70%
मरीजों में सफलता भी मिलती है। 30-40% लोगों की मृत्यु भी हो जाती है। ऐसे में यह सोचकर
की मरीज वेंटीलेटर के लगाने को अस्पतालों के पैसा बनाने का माध्यम समझेगा तो डॉक्टर
हो या अस्पताल दोनों ही इस तरह के जोखिम उठाने से कतराएंगे पालस्वरूप सिर्फ एक अफवाह
के कारण 70 % लोगों को भी मौत के मुँह में धकेलना होगा। क्यूंकि परिजनों को लाख समझने
के बावजूद भी उनको ऐसा लगेगा की उन्होंने किसी अखबार न्यूज़ चैनल या फिर सोशल मीडिया
पर पढ़ा था कि वेंटीलेटर डॉक्टरों द्वारा पैसा कमाने के लिए लगाया जाता है इसलिए मरीज
के परिजनों का विश्वास भी चिकित्सकों से उठेगा जिसका परिणाम घातक है।
आइये आपको
भी बता देते है मुर्दे और जिन्दे में कुछ फर्क जिससे आप खुद समझ जायेंगे मरीज जिन्दा
है या मर चूका है:
ये सारे परिक्षण आप
खुद कर सकते हैं
बशर्तें पूरा ध्यान लगाकर नहीं तो
आप किसी जिन्दे को
मुर्दा बता सकते हैं:
- सबसे पहले मरीज हाथ पैर चला रहा है या नहीं यदि नहीं तो अपने चिकित्सक से पूछे किसी नींद या दर्दनिवारक दवा का प्रयोग तो नहीं किया जा रहा है।
- गर्दन के बगल में नाड़ी जिसको कैरोटिड पल्स कहते हैं धड़क रहीं है या नहीं। नहीं चल रही मतलब मरीज का ह्रदय बंद हो चूका है अथवा मृत हो चूका है।
- आप चाहें तो चिकित्सक को लिखित आवेदन कर 15-20 सेकंड तक वेंटीलेटर निकलवाकर देख सकते हैं मरीज की अपनी श्वास थोड़ा बहुत है भी या नहीं। ध्यान रहे ऐसा करते समय अपने चिकित्सक से पूँछ लें की वे मरीज को कोई दर्द निवारक दवा तो नहीं दे रहे हैं। कुछ बीमारियां ऐसी भी हैं की मरीज होश में रहता है लेकिन भरी ऑक्सीजन की कमी के कारण उसे वेंटीलेटर लगाना पड़ता है ऐसी स्थिति में चिकित्सकों द्वारा कुछ सामान्य बेहोशी या नींद की दवाइयां प्रयोग की जाती है ताकि मरीज वेंटीलेटर ट्यूब को न खींचे। या ठीक तरह से श्वास पहुचायी जा सके।
- मरीज को खांसी या सक्शन करते समय खांसी आती है या नहीं।
- आँखों के भीतर की पुतली टोर्च की रौशनी मारने पर छोटी बड़ी या सिकुड़ती है या नहीं। पुतली नहीं सिकुड़ती या ५ मिलीमीटर से ऊपर है तो मतलब साफ है की ब्रेन ने काम करना बंद कर दिया है बशर्ते मरीज को अट्रोपीने नमक इंजेक्शन न दिया गया हो।
उपरोक्त सभी परिक्षण
सामान्यतः आप सावधानी
बरतते हुए खुद
कर सकते हैं
या फिर किसी
नर्स से आग्रह
करके बताने का
आग्रह कर सकते
है जिससे मरीज
के मुर्दा और
जिन्दा होने का
सबूत मिल जायेगा।
झगड़े का कारण वेंटीलेटर या बिल?
एक्सीडेंट में सर
की चोट या
फिर ब्रेन हेमरेज
के कारण या
ब्रेन में ऑक्सीजन
की कमी के
कारण कुछ प्रतिशत
मरीजों का ब्रेन
काम करना पूर्णतः
बंद कर देता
है जिसे डॉक्टरी
की भाषा में
ब्रेन डेड कहते
है। इस
स्थिति में मरीज
का हार्ट, लिवर,
किडनी पूरी तरह
कुछ दिन या
घंटे पूर्ण रूप
से काम करते
है बस मरीज
की श्वास पूर्णतः
समाप्त हो जाती
है मतलब पूर्णतः
कोमा में होता
है। ऐसे मरीजों
के बारे में
चिकित्सकों द्वारा परिजनों को
मरीज की गंभीरता
के बारे में
बार-बार समझाया
भी जाता है
यहाँ तक की
चिकित्सक कई बार
खुलकर भी बता
देते है की
मरीज कोमा में
है यानि ठीक
नहीं हो सकता
है लेकिन जब-तक हार्ट,
नाड़ी पूर्णतः बंद
न हो मृत
घोषित करना कानूनी
रूप से ठीक
नहीं है। कई
ऐसे मामलों चिकित्सक
सलाह देते हैं
तो परिजन विवाद
भी करते है
की हार्ट चल
रहा है फिर
क्यों इलाज कराने
से मना कर
रहे है। चिकित्सकों
की असमंजस की
स्थिति में परिजनों
के दबाव, कानूनी
पेंच के कारण
चिकित्सक जब-तक
मरीज का हार्ट-नाड़ी पूर्णतः
बंद न हो
जाये तब तक
मृत घोषित नहीं
कर सकते। ऐसे
में मरीज के
सेहत में सुधार
नहीं होगा परिजन
को भी पता
होता है और
चिकित्सक को भी
फिर भी इलाज
परिजन इलाज करते
रहते है। फलस्वरूप
रोज वेंटीलेटर एवं
ऑक्सीजन खर्चे, दवाइयों का
खर्च निजी संस्थानों
में लगता रहता
है और कुछ
ही दिनों में
मरीज की मृत्यु
भी हो जाती
है। मृत्यु के
बाद हमने परिजनों
में भरी और
अप्रत्याशित बदलाव देखा है
जिनको सौ से
जयादा बार समझाया
होता है वह
भी खड़े होकर
चिकित्सकों पर अनर्गल
आरोप लगते हैं
और झगडे भी
करते रहते हैं।
जैसे ही अस्पताल
प्रशासन दबाव में
आकर बिल माफ़
करता है वैसे
ही मामला पूरा
ठीक हो जाता
है ऐसे कैसे
होता है? आप ही
बता सकते हैं!
आज तक इस
प्रकार का कोई
मामला अदालत में
साबित नहीं हो
पाया है की
किसी चिकित्सक ने
ऐसा किया हो।
बस मीडिया में
सनसनी फ़ैलाने का
काम जरूर मिल
जाता है।
इस तरह के
अफवाह और मानसिकता
से सिर्फ मरीज
का नुक्सान हो
सकता है एक
दिन ऐसा आएगा
कि चिकित्सक भी
वेंटीलेटर लगाने से कतराएगा।
वैसे अफवाहों का
भी यही कहना
है कि चिकित्सक
वेंटीलेटर लगाकर लूटते हैं
तो चिकित्सकों को
भी चाहिए कि
वेंटीलेटर न लगाएं
फिर क्या एक
लड़ाकू समाज और
चिकित्सक की सवेदनशीलता
ठीकठाक रूप में
ख़तम होती दिखाई
देगी।
ब्रेन डेड के बाद परिजनों को करना चाहिए ये महान कार्य
जैसा कि हमने
बताया कि ब्रेन
डेड होने पर
मरीज के हार्ट,
किडनी, लिवर कुछ
दिन या घंटों
तक ठीक रूप
से काम करता
रहता है। ऐसी
स्थिति में परिजनों
को समझदारी का
काम करना चाहिए
कि वे अपने
मरीज के अंगदान
करने के लिए
अस्पताल प्रबंधन से कहे।
चूँकि पता है
कि ब्रेन डेड
के मरीज ठीक
नहीं होता ऐसी
स्थिति में समय
रहते अंगदान करके
चार-पांच लोगों
को नया जीवन
मिल सकता है।
इससे बड़ा परोपकार
क्या हो सकता
है। साथ ही
परिजनों को हमेशा
इस बात का
अहसास होता रहेगा
कि उनके लाड़ले
या लाड़ली का
दिल किसी और
के शरीर में
धड़क रहा है।
जैसा कि हम
जानते है कि
कितने लोग अंगदान
के इंतजार में
है और कुछ
इस दुनिया से
चले गए ऐसे
में महत्वपूर्ण अंगों
को मिटटी और
राख में मिलाने
से बेहतर है
कि किसी और
को जीवन दान
दें। आपको बता
देते हैं कि
ब्रेन डेड का
मरीज मृत नहीं
होता बल्कि सिर्फ
दिमाग पूर्णतः डेड
हो जाता है
जिसे ठीक करने
का कोई विज्ञानं
नहीं है। ऐसी
स्थिति में ही
अंगदान किया जाता
है।
बहुत लम्बा लेख लिखना पड़ा
है उम्मीद है
कि अब अफवाहों
को रोकने में
आप भी सहयोगी
होंगे।
