रामगोपाल बड़ा ही गरीब था। पेशे से वह मजदूर था। जैसे तैसे कर वह अपने परिवार का भरण पोषण करता था। रामगोपाल स्वाभाव से थोड़ा चालाक था और नए गुण सिखने की कला में माहिर भी था।
रामगोपाल मजदूरी की तलाश में शहर के एक बड़े सेठ फैक्ट्री में पंहुचा और बड़े मिन्नतों के बाद सेठ ने रामगोपाल को अपने फैक्ट्री में एक साधारण मजदूर के पद पर नियुक्त कर दिया। हालाँकि सेठ जेठालाल को रामगोपाल के चेहरे पर बिलकुल भरोषा नहीं हो रहा था कि यह कुछ कर पायेगा फिर फाई उसकी स्थितियों पर दया करके सेठ ने उसे नौकरी पर लगा लिया।
रामगोपाल सेठ जेठालाल की फैक्ट्री में जी तोड़ मेहनत करता था साथ ही साथ अपने मेहनत और चतुर दिमाग के बल पर सेठ के ह्रदय में अपनी जगह बना ली, फिर क्या सेठ जेठालाल रामगोपाल की मेहनत से खुश होकर रामगोपाल को पदोन्नत कर दिया अब रामगोपाल एक साधारण मजदूर से फैक्ट्री का सुपरवाइजर बन चूका था। रामगोपाल की तनख्वाह भी बढ़ चुकी थी और बड़ा मन लगाकर काम करने लगा। धीरे धीरे सेठ जेठालाल का व्यापार में और भी बढ़ोत्तरी होने लगी।
अब सेठ जेठालाल और रामगोपाल के बीच एक मालिक और नौकर का सम्बन्ध नहीं बल्कि रामगोपाल सेठ जेठालाल के परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य हो चूका था। यहाँ तक कि सेठ जेठालाल रामगोपाल के विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं थे।
सब कुछ ठीक चल रहा था रामगोपाल की तरक्की भी हो रही थी। कुछ वर्ष बाद समय चक्र घुमा और सेठ जेठालाल के एक करीबी का बेटा दीपक कुमार प्रबंधन शास्त्र की पढाई बाहर से पढ़लिखकर आया चूँकि सेठ के मित्र का बेटा होने के कारण उसे भी सेठ ने अपनी फैक्ट्री में प्रबंधक के तौर पर नियुक्त कर दिया। दीपक के नियुक्ति पर सबसे ज्यादा ख़ुशी रामगोपाल को थी कि सेठ के करीबी मित्र का पढ़ालिखा बेटा दीपक अब रामगोपाल के अधीनस्थ कार्य करेगा, हालाँकि दीपक और रामगोपाल में कुशलता का फर्क जमीन और आसमान का था परन्तु सेठ की नज़रों में अभी भी रामगोपाल का दर्जा सर्वोपरि था।
एक दिन नवनियुक्त दीपक ने फैक्ट्री के कुछ कार्यों में कुछ अनियमितताएं देखी और उन्हें सुधारने की कोशिश में लग गया। यह बात रामगोपाल को नागवार गुजरी और दीपक को समझाया कि वह ऐसा कोई कार्य न करे जिससे कि सेठ के मन में यह सवाल उत्पन्न हो कि रामगोपाल ऐसा क्यों नहीं कर पाया ? परन्तु दीपक भी अपने काम को लेकर थोड़ा जिद्दी स्वाभाव का था एक बार उसने जो ठान ली उसे पूरा करके ही मानता था और उसके अंदर भी सेठ के व्यापार में बढ़ोत्तरी करने का भूत सवार था। दीपक तमाम विरोधाभाषों के बावजूद भी अपना कार्य करता रहा चूँकि दीपक को यह विश्वास था कि रामगोपाल सेठ जेठालाल का सबसे विश्वशनीय आदमी है इसलिए दीपक कभी भी रामगोपाल पर शक नहीं करता था जबकि रामगोपाल ऐसे कई कार्य करता था जो कि दीपक को न्यायसंगत एवं तर्कसंगत नहीं लगता था।
दीपक को एक फैक्ट्री में कार्य करते एक वर्ष बीत चुके थे और सेठ जेठालाल एवं दीपक के बीच एक बेहतर समन्वय स्थापित हो चूका था। सेठ जेठालाल अब दीपक की हर बातों को रामगोपाल की बातों से ज्यादा महत्व देने लगे थे और मानते भी क्यों नहीं रामगोपाल अपने दसवीं सताब्दी के ज्ञान से बाहर ही नहीं आना चाहता था वही दूसरी तरफ दीपक हमेशा दुनिया के तमाम तकनिकी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सेठ के धंधे में अपना हाथ बटाता था।
सेठ जेठालाल की नज़रों में अब दीपक की पूछ परख रामगोपाल से ज्यादा हो चुकी थी इस बात से मन ही मन रामगोपाल दीपक से चिढ़ने लगा था। रामगोपाल को ऐसा लगता था कि कही दीपक मेरी कुर्सी न छीन ले। रामगोपाल मन ही मन परेशान रहने लगा उसे तमाम प्रकार के मानसिक विकार उत्पन्न होने लगे, दूसरी तरफ दीपक अपने कार्यों के तकनिकी के माध्यम से सेठ के साथ साथ अन्य कर्मचारियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहा था।
रामगोपाल दीपक के बढ़ते दखल एवं ओहदे से काफी परेशान रहने लगा। एक दिन रात को रामगोपाल ने दीपक को अपने रास्ते से हटाने का मास्टर प्लान तैयार किया और अगले ही दिन से दीपक के खिलाफ षड़यंत्र करना प्रारम्भ कर दिया। शुरूआती कुछ दिनों तक रामगोपाल अकेला षड़यंत्र करता था लेकिन अब वह अपने सेठ की अपने प्रति विश्वसनीयता का रौब दिखाकर और लोगो को भी दीपक के विरुद्ध किये जा रहे षड़यंत्र का हिस्सा बना लिया।
रामगोपाल अब दीपक से डायरेक्ट टकराना चाहता था परन्तु शिक्षा और विवेक के अभाव में हमेशा पीछे हट जाया करता था परन्तु अपने अधीनस्थ कार्यरत कर्मचारियों को दीपक के विरुद्ध भड़काकर उन्हें दीपक के खिलाफ कार्य करने हेतु बाध्य करता था। रामगोपाल और दीपक में सिर्फ एक ही बड़ा अंतर था वह था कि रामगोपाल सेठ जेठालाल के बिना जीरो था और दीपक अपने कार्यकुशलता के दम पर कही भी कार्य करने की क्षमता रखता था। अब रामगोपाल दीपक के हर कार्य में बाधा बन रहा था जबकि रामगोपाल को यह पता रहता था कि दीपक के कार्य में बाधा डालने का मतलब सीधे सीधे सेठ जेठालाल के व्यापार को नुक्सान पहुंचाना होता था लेकिन रामगोपाल आत्ममुग्ध बौने की भांति अपनी कुर्सी जाने के भय से दीपक के विरुद्ध षड़यंत्र करता रहता था।
एक दिन की बात है जब दीपक ने सेठ को बताया कि एक नया व्यापार शुरू करते है जिसमें लगभग दस कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ेगी यदि सेठ इस व्यापार को करने की अनुमति देते हैं तो उन्हें करोङों रूपये का फायदा हो सकता है। दीपक जब सेठ जेठालाल को अपने इस प्लान के बारे में बता रहा था तो रामगोपाल उसी कमरे में मौजूद था। सेठ जेठालाल ने दीपक को नए प्लान पर काम करने की अनुमति दे दी और रामगोपाल को भी सहयोग करने के लिए कहा।
रामगोपाल और दीपक दोनों ही सेठ जेठालाल के सामने हामी भरकर कमरे से बाहर आ गए , लेकिन रामगोपाल दीपक के इस प्लान से काफी नाखुश था उसे लगा कि यदि दीपक यह कार्य करने में सफल रहा तो रामगोपाल की पूछ परख और काम हो जाएगी और सेठ की नज़रों में रामगोपाल की कीमत कौड़ी के बराबर भी नहीं बचेगी। उसी क्षण रामगोपाल ने कुछ अलग करने को सोचा जिससे कि दीपक के प्लान को पूरा होने से रोका जा सके। रामगोपाल थोड़ा मंदबुद्धि भी था वह यह भूल जाता था कि दीपक जो भी कार्य कर रहा था उसमें सेठ जेठालाल की पूर्ण सहमति होती थी फिर भी कहते हैं 'न चतुर सात जगह डूबता है' ठीक उसी प्रकार रामगोपाल ने दीपक के इस प्लान को रोकने के लिए एड़ी छोटी एक कर दी।
सेठ जेठालाल ने रामगोपाल को निर्देश दिए थे कि दस कर्मचारियों के साथ रामगोपाल दीपक के कार्य में सहयोग करेंगे। अब दीपक अपने कार्य में लग चूका था लेकिन पहले दिन सबसे पहले रामगोपाल पहुंचा और सिर्फ दो अन्य कर्मचारी , दीपक के पूछने पर रामगोपाल ने बताया कि कर्मचारी नहीं आये। और दूसरे दिन सिर्फ रामगोपाल अकेले ही पंहुचा। दीपक ने चेतावनी दिया कि यदि यही हाल रहा तो कार्य पूरा नहीं हो सकता फिर क्या तीसरे दिन सिर्फ तीन कर्मचारी पहुंचे रामगोपाल नहीं। जब दीपक ने रामगोपल से न आने का कारण पूछा तो रामगोपाल ने बड़े अहम् के साथ कहा कि कर्मचारी हैं ही नहीं तो कहा से लाएं।
रामगोपाल की इस बात पर दीपक को बड़ा आश्चर्य हुआ कि सैकड़ों कर्मचारियों को नौकरी देने वाला संस्थान दस कर्मचारी जुटाने में असफल कैसे हो सकता है? इस सवाल का जबाब ढूंढने के लिए अगले दिन सभी दस कर्मचारियों को अलग अलग बुलाकर उनके साथ बैठक कर न आने का कारण पूछा तो पता चला कि रामगोपाल ने ही उन्हें काम पर आने मन किया था और कहा था कि कोई पूछे क्यों नहीं आये तो कुछ कुछ बहाना बना देना। कर्मचारियों में यह भी बताया कि रामगोपाल ने उन्हें धमकाया भी कि यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें नौकरी से निकाल देगा।
यह सब समझने में सुमित से देर हो चुकी थी और करोङों रूपये के प्रोजेक्ट पर मात्र एक रामगोपाल की वजह से पानी फिर चूका था परन्तु रामगोपाल ने ऐसा क्यों किया यह जानना भी दीपक के लिए अभी शेष रह गया था लेकिन कहते है 'न रेत के चित्र ज्यादा देर समुद्र के किनारे नहीं टिकते'। कुछ दिनों में परते खुली तो पता चला कि रामगोपाल सिर्फ अपनी कुर्सी और वर्चस्व बनाये रखने के लिए सेठ जेठालाल को कई बार नुक्सान पहुंचा चूका है। तब जाकर दीपक को कहानी का असली किरदार समझ में आया।
कहानी का सार :
हमारे एक हाथ में पांच उंगलिया है और सभी प्यारी भी हैं परन्तु कोई भी ऊँगली पूरे शरीर के लिए जहर बन जाये तो उसे काटना ही बेहतर होता है क्यों कि सड़े हुए अंगों का इलाज कर उन्हें ठीक करने की व्यर्थ कोशिश करना जान को जोखिम में डालने के बराबर होता है।
ठीक इसी प्रकार जब किसी संस्थान में कोई कर्मचारी अपने निजी स्वार्थ के लिए संस्थान की तरक्की में आड़े आने लगे तो तत्काल उसे पद से हटाना ही बेहतर उपाय है अन्यथा ऐसे स्वार्थी एवं लालची प्रवृति के लोग ही किसी भी सस्थान को डुबाने के लिए अकेले काफी होते हैं।
